कभी लिखा था मैंने,
और आज बेसाख्ता याद आ रहा है...
इश्क होता है जन्नत अगर उसका अपना कोई मुकाम हो,
इश्क होता है इश्क अगर वह बेतरह नाकाम हो...
ज़रूरी नहीं की हर चाहत का एक अंजाम हो,
इश्क वोही जिसमे होश फाख्ता और समझ हैरान हो !!
मुक़र्रर तो कहिये... :)
Friday, February 1, 2008
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